भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने 6 अगस्त 2025 को अपनी तीसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा की। इस बैठक में, गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति ने रेपो रेट को 5.50% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। यह निर्णय हाल के महीनों में 100 बेसिस पॉइंट्स की संचयी कटौती के बाद लिया गया, जिसने रेपो रेट को फरवरी 2025 के 6.50% से घटाकर वर्तमान स्तर पर ला दिया। इस लेख में हम इस नीति के प्रमुख बिंदुओं, इसके प्रभावों और विशेषज्ञों की राय पर चर्चा करेंगे।
महत्वपूर्ण बिंदु: आरबीआई मौद्रिक नीति, 6 अगस्त 2025
- रेपो रेट अपरिवर्तित: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रेपो रेट को 5.50% पर स्थिर रखा। रिवर्स रेपो रेट 3.35% और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) रेट 5.75% पर अपरिवर्तित।
- जीडीपी वृद्धि अनुमान: वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी वृद्धि अनुमान 6.5% पर बरकरार।
- मुद्रास्फीति अनुमान: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति अनुमान को 3.7% से संशोधित कर 3.1% किया गया, जो जून 2025 के 2.10% के निचले स्तर के अनुरूप है।
- नीतिगत रुख: आरबीआई ने ‘न्यूट्रल’ रुख बनाए रखा, जो भविष्य में डेटा-आधारित निर्णयों की ओर इशारा करता है।
- वैश्विक और घरेलू कारक: अमेरिका के 25% आयात शुल्क (7 अगस्त 2025 से) और औद्योगिक क्षेत्र की सुस्ती के कारण सतर्क दृष्टिकोण अपनाया गया।
- प्रभाव: होम लोन और अन्य ईबीएलआर-लिंक्ड ऋणों की ब्याज दरें स्थिर रहेंगी; एमसीएलआर-लिंक्ड ऋणों में बैंकों द्वारा बदलाव संभव।
- अगली बैठक: 29 सितंबर से 1 अक्टूबर 2025 तक, जिसमें वैश्विक व्यापार और घरेलू आर्थिक संकेतकों पर विचार होगा।
यह नीति आर्थिक स्थिरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच संतुलन बनाए रखने पर केंद्रित है।
नीति का अवलोकन
आरबीआई की एमपीसी बैठक 4 से 6 अगस्त तक चली, जिसमें समिति ने मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं जैसे कारकों पर विचार-विमर्श किया। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने घोषणा की कि रेपो रेट को 5.50% पर स्थिर रखा गया है, जो पिछले तीन नीतिगत कटौतियों के बाद एक रुकावट को दर्शाता है। इसके साथ ही, रिवर्स रेपो रेट 3.35% और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (एमएसएफ) रेट 5.75% पर अपरिवर्तित रहे।
इस नीति में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि अनुमान को 6.5% पर बरकरार रखा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति के लिए अनुमान को जून के 3.7% से संशोधित कर 3.1% कर दिया गया, जो छह साल के निचले स्तर 2.10% (जून 2025) के अनुरूप है। यह संकेत देता है कि मुद्रास्फीति नियंत्रण में है, जो नीतिगत स्थिरता के लिए अनुकूल है।
नीति के पीछे का तर्क
एमपीसी का यह निर्णय वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के संतुलन को दर्शाता है। हाल के महीनों में, भारत की अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है, जिसमें पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि 7.4% रही। हालांकि, औद्योगिक क्षेत्र में सुस्ती और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताएं, विशेष रूप से अमेरिका द्वारा 7 अगस्त 2025 से भारतीय आयात पर 25% टैरिफ की घोषणा, चिंता का विषय हैं। इन कारकों ने आरबीआई को सतर्क रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया।
विशेषज्ञों की राय इस नीति को लेकर बंटी हुई थी। ज़ी बिज़नेस के एक सर्वेक्षण में 60% विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होगा, जबकि 40% ने 25 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की उम्मीद जताई। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की एक रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की कटौती से दिवाली से पहले क्रेडिट वृद्धि को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे उपभोक्ता खर्च में वृद्धि होगी। हालांकि, आरबीआई ने पिछले दर कटौतियों के प्रभाव को अर्थव्यवस्था में प्रसारित होने देने का विकल्प चुना।
नीति का प्रभाव
रेपो रेट को स्थिर रखने का मतलब है कि बाहरी बेंचमार्क ऋण दरों (ईबीएलआर) से जुड़े ऋणों की ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि, मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) से जुड़े ऋणों पर ब्याज दरों में बैंकों द्वारा संशोधन किया जा सकता है। यह निर्णय उपभोक्ताओं के लिए होम लोन और अन्य ऋणों की ईएमआई को स्थिर रखेगा, लेकिन यह बचत खातों और सावधि जमा (एफडी) पर ब्याज दरों को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
आरबीआई ने अपनी नीति को ‘न्यूट्रल’ बनाए रखा है, जो यह संकेत देता है कि भविष्य के निर्णय डेटा पर निर्भर होंगे। गवर्नर मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहा है। अगली एमपीसी बैठक 29 सितंबर से 1 अक्टूबर 2025 तक निर्धारित है, जिसमें वैश्विक व्यापार नीतियों और घरेलू आर्थिक संकेतकों के आधार पर और नीतिगत बदलावों पर विचार किया जाएगा।
आरबीआई की अगस्त 2025 की मौद्रिक नीति ने स्थिरता और सतर्कता का संदेश दिया है। रेपो रेट को अपरिवर्तित रखने का निर्णय वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश है। यह नीति उपभोक्ताओं और निवेशकों के लिए स्थिरता प्रदान करती है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देती है कि आरबीआई भविष्य में डेटा-आधारित निर्णय लेने के लिए तैयार है।