प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसवाड़ा गांव में एक जाट परिवार में हुआ। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहां उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, और उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपनी पढ़ाई पूरी की। मलिक ने मेरठ विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक (बी.एससी.) की डिग्री हासिल की और इसके बाद कानून में डिग्री (एलएलबी) प्राप्त की। शिक्षा के दौरान उनकी रुचि छात्र राजनीति की ओर बढ़ी। 1968-69 में वे मेरठ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए। इस पद ने उन्हें नेतृत्व कौशल और राजनैतिक समझ विकसित करने का अवसर प्रदान किया, जिसने उनके भविष्य के राजनैतिक करियर की नींव रखी। छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर आवाज उठाई, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।

राजनैतिक जीवन की शुरुआत

सत्यपाल मलिक का राजनैतिक सफर 1970 के दशक में शुरू हुआ। 1974 में उन्होंने चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के टिकट पर बागपत से उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस चुनाव में उन्होंने 42.4% वोट प्राप्त कर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के आचार्य दीपांकर को हराया, जिन्हें 31.6% वोट मिले। 1974 से 1977 तक वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण विकास और किसानों के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया। इसके बाद, भारतीय लोकदल के गठन के साथ वे इस पार्टी में शामिल हो गए और इसके महासचिव बने। उनकी संगठनात्मक क्षमता और जनता से जुड़ने की कला ने उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

1980 में सत्यपाल मलिक को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुना गया, जहां उन्होंने 1986 तक सेवा की। 1986 में उन्हें दोबारा राज्यसभा के लिए चुना गया और 1989 तक इस पद पर रहे। 1989 में जनता दल के टिकट पर वे अलीगढ़ से 9वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए और 1991 तक इस पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने विभिन्न राजनैतिक दलों, जैसे समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और लोकदल, के साथ काम किया। उनकी यह बहुमुखी राजनैतिक यात्रा उनकी अनुकूलन क्षमता और राजनैतिक समझ को दर्शाती है। मलिक ने हमेशा किसानों और ग्रामीण समुदाय के हितों को प्राथमिकता दी, जिसके कारण उन्हें जनता के बीच व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

विभिन्न राज्यों के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल

सत्यपाल मलिक का गवर्नर के रूप में करियर 2017 में शुरू हुआ, जब उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया। वे अक्टूबर 2017 से अगस्त 2018 तक इस पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने बिहार में शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया। मार्च 2018 से मई 2018 तक उन्हें ओडिशा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया। इस अवधि में उन्होंने दोनों राज्यों में संवैधानिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया।

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल

अगस्त 2018 में सत्यपाल मलिक को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। यह उनका सबसे चर्चित और चुनौतीपूर्ण कार्यकाल था। 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस फैसले के साथ ही जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया। मलिक ने इस संवेदनशील समय में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और जनता के बीच विश्वास बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए। हालांकि, बाद में उन्होंने इस दौरान हुई कुछ गलतियों, विशेष रूप से 2019 के पुलवामा हमले के संबंध में, केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की।

गोवा और मेघालय के राज्यपाल

जम्मू-कश्मीर के बाद, मलिक को नवंबर 2019 में गोवा का 18वां राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद, अक्टूबर 2020 से अक्टूबर 2022 तक वे मेघालय के 21वें राज्यपाल रहे। गोवा में उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने पर्यटन और स्थानीय विकास पर जोर दिया, जबकि मेघालय में उन्होंने आदिवासी समुदायों के कल्याण और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया। दोनों राज्यों में उनके कार्यकाल को प्रशासनिक दक्षता और स्थानीय मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के लिए जाना गया।

विवाद और बेबाक बयानबाजी

सत्यपाल मलिक अपने बेबाक और स्पष्टवादी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कई मौकों पर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की नीतियों की खुलकर आलोचना की। 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली की सीमाओं पर 700 किसानों की मृत्यु हुई, लेकिन केंद्र सरकार ने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मलिक ने यह भी कहा कि यदि वे उस समय जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के बजाय स्वतंत्र व्यक्ति होते, तो वे किसानों के साथ सड़कों पर होते।

पुलवामा हमले पर विवाद

मलिक ने 2019 के पुलवामा हमले के संबंध में गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि इस हमले में खुफिया और प्रशासनिक विफलताएं थीं। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीआरपीएफ के लिए विमान उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण जवान सड़क मार्ग से यात्रा कर रहे थे। मलिक ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल ने उन्हें इस मामले में चुप रहने के लिए कहा था। इन बयानों ने राजनैतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं। मलिक ने यह भी दावा किया कि बीजेपी ने पुलवामा हमले का चुनावी फायदा उठाया, जिससे उनकी आलोचना और बढ़ी।

किरू जलविद्युत परियोजना और सीबीआई जांच

मलिक ने जम्मू-कश्मीर में किरू जलविद्युत परियोजना में कथित भ्रष्टाचार को उजागर किया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें 300 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। मलिक ने इस परियोजना के टेंडर को रद्द करने का निर्णय लिया था। हालांकि, इसके बावजूद, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उनके खिलाफ इस मामले में जांच शुरू की। मलिक ने इसे केंद्र सरकार द्वारा उन्हें बदनाम करने की साजिश बताया। उन्होंने कहा कि 50 साल के राजनैतिक करियर के बाद भी वे एक साधारण जीवन जीते हैं और कर्ज में हैं।

निधन

सत्यपाल मलिक का निधन 5 अगस्त 2025 को दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में हुआ। वे 79 वर्ष के थे और लंबे समय से किडनी से संबंधित गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। मई 2025 से वे अस्पताल में भर्ती थे, और उनकी स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई थी। उनके निजी सचिव केएस राणा ने उनके निधन की पुष्टि की। उनके निधन की खबर सबसे पहले उनके आधिकारिक ट्विटर हैंडल से साझा की गई। 6 अगस्त 2025 को उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन ने देश भर में शोक की लहर दौड़ा दी।

विरासत

सत्यपाल मलिक का राजनैतिक जीवन विविधताओं और साहसिक निर्णयों से भरा रहा। एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से शुरूआत कर वे चार राज्यों के राज्यपाल बने। उनकी बेबाक बयानबाजी और सच्चाई के प्रति निष्ठा ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया। किसान आंदोलन और पुलवामा हमले जैसे मुद्दों पर उनके साहसिक बयानों ने उन्हें एक निडर नेता के रूप में स्थापित किया। मलिक का जीवन इस बात का उदाहरण है कि मेहनत और सिद्धांतों के बल पर कोई भी व्यक्ति उच्च पदों तक पहुंच सकता है। उनकी विरासत भारतीय राजनीति में हमेशा जीवित रहेगी।

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