कर्नल सोफिया कुरैशी: भारतीय सेना की पहली महिला दल प्रमुख का प्रेरणादायक सफर
भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका को लंबे समय तक सीमित समझा जाता था, लेकिन समय के साथ इस सोच में व्यापक बदलाव आया है। इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण प्रतीक हैं कर्नल सोफिया कुरैशी, जिन्होंने न केवल अपनी काबिलियत से भारतीय सेना में एक नया मुकाम हासिल किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का नाम रोशन किया। इस लेख में हम कर्नल सोफिया कुरैशी के जीवन, उनके सैन्य करियर, उपलब्धियों और प्रेरणादायक यात्रा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

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प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
कर्नल सोफिया कुरैशी का जन्म 18 अप्रैल 1972 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुआ था। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हैं। बचपन से ही उनमें एक खास नेतृत्व क्षमता और अनुशासन देखने को मिलता था।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ के एक प्रतिष्ठित विद्यालय से प्राप्त की। उसके बाद, उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर से इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। तकनीकी ज्ञान और नेतृत्व कौशल के साथ उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने का सपना संजोया।
सैन्य करियर की शुरुआत

1994 में सोफिया कुरैशी भारतीय सेना की ‘सिग्नल कोर’ में अधिकारी के रूप में नियुक्त हुईं। उस समय महिला अधिकारियों की संख्या सेना में बेहद सीमित थी। शुरुआती दिनों में उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
उनकी मेहनत और समर्पण के चलते उन्हें जल्द ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलने लगीं। उन्होंने तकनीकी संचार, साइबर सुरक्षा और युद्ध रणनीतियों में विशेषज्ञता हासिल की और भारतीय सेना के कई महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया।
संयुक्त राष्ट्र मिशन में ऐतिहासिक उपलब्धि
2006 में कर्नल सोफिया कुरैशी ने एक नया इतिहास रच दिया जब उन्हें संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन के तहत कांगो भेजे गए भारतीय दल का नेतृत्व सौंपा गया। यह पहली बार था जब किसी भारतीय महिला अधिकारी ने एक अंतरराष्ट्रीय मिशन में पुरुष सैनिकों के दल का नेतृत्व किया।
इस मिशन के दौरान उन्होंने न केवल भारतीय दल को कुशलतापूर्वक नेतृत्व दिया, बल्कि स्थानीय नागरिकों की सहायता और हिंसा में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने जैसे मानवीय कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
फोर्स 18 अभ्यास की पहली महिला कमांडर
2016 में कर्नल सोफिया कुरैशी को एक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी दी गई। उन्हें ‘एक्सरसाइज फोर्स 18’ नामक एक बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भारतीय दल का नेतृत्व करने के लिए चुना गया। यह अभ्यास दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।
इस अभ्यास में भारत सहित 18 देशों की सेनाओं ने भाग लिया। यह पहला मौका था जब किसी भारतीय महिला अधिकारी ने इतने बड़े स्तर पर किसी सैन्य अभ्यास में भाग लेने वाली टुकड़ी का नेतृत्व किया। उनके आत्मविश्वास, रणनीतिक सोच और संचार कौशल की सभी देशों ने सराहना की।
ऑपरेशन सिंदूर (2025)
2025 में एक और महत्वपूर्ण मोर्चे पर कर्नल कुरैशी ने अपनी भूमिका निभाई। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अंतर्गत उन्हें एक साइबर-सक्षम त्वरित तैनाती इकाई का नेतृत्व सौंपा गया, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाना था।
यह ऑपरेशन तकनीकी दृष्टि से अत्यंत जटिल था, लेकिन उन्होंने अपने दल को बेहतरीन तरीके से तैयार किया और बिना किसी हानि के मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। इसके बाद उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया।
सम्मान और पुरस्कार
कर्नल सोफिया कुरैशी को उनके अद्वितीय योगदान के लिए कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं:
- सेना मेडल (2025): ऑपरेशन सिंदूर के लिए
- विशिष्ट सेवा मेडल (2019): सेवा के प्रति उत्कृष्ट समर्पण
- संयुक्त राष्ट्र शांति सेवा मेडल (2017): कांगो मिशन में भूमिका के लिए
- COAS कमेंडेशन (2010): भारतीय सेना प्रमुख द्वारा सम्मान
- पूर्वी कमान कमेंडेशन (2003): क्षेत्रीय नेतृत्व में उत्कृष्टता
निजी जीवन और व्यक्तित्व
कर्नल सोफिया कुरैशी का निजी जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक है जितना उनका सैन्य करियर। उनकी शादी डॉ. विक्रम सिंह से हुई है, जो जेएनयू में प्रोफेसर हैं। उनके एक बेटी भी है।
वह हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और फ्रेंच भाषाओं में दक्ष हैं। उन्हें किताबें पढ़ना, पर्वारोहण और सामाजिक कार्यों में भाग लेना पसंद है। वह महिलाओं को सशक्त बनाने और सेना में उनकी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में लगातार काम करती रहती हैं।
समाज में प्रभाव
कर्नल कुरैशी ने यह सिद्ध कर दिया है कि महिलाएं न केवल युद्ध के मैदान में बल्कि रणनीति, तकनीक और नेतृत्व के हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर या बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। वह उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं जो सेना में करियर बनाना चाहती हैं।
उनकी उपलब्धियाँ न केवल सैन्य क्षेत्र में बल्कि सामाजिक चेतना में भी क्रांति लेकर आई हैं। उन्होंने रूढ़ियों को तोड़ा और महिलाओं की क्षमताओं को सामने लाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
कर्नल सोफिया कुरैशी की कहानी सिर्फ एक सैन्य अधिकारी की नहीं है, बल्कि वह एक सोच की प्रतीक हैं — एक ऐसी सोच जो कहती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा रास्ते की रुकावट नहीं बन सकती। उन्होंने अपने साहस, समर्पण और नेतृत्व क्षमता से यह साबित कर दिया है कि भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका महज़ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक भी हो सकती है।
उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है जो अपने सपनों को साकार करना चाहता है, चाहे राह कितनी भी कठिन क्यों न हो।